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बुधवार, 3 अगस्त 2011

तलाश

अपनी गरीब मां की फटी धोती में लगे पैबन्द जैसा
समाज के चेहरे पर फूहड़ और बदसूरत मैं,
अपने बूढ़े बाप के बुझ चुके चिलम की राख जैसे
मेरे अरमान ,
फिर लहकने की चाह में
न जाने कितने सुबहों के सूरज से आग मांगे हैं,
ठंड से सिकुड़े मेरे कुत्तों के जिस्म जैसे मेरे ही ख्वाब
जले कागज से सिकुड़ गये हैं,
मेरे खेतों की मेड़ जैसे सामाजिक मूल्य
रोज़-रोज़ संकरे किये जा रहे हैं,
मेरे कैक्टस के कांटों जैसे
समाज के नुकीले-जहरीले दांत
काट खाने को तैयार,
गन्धहीन कलमी गुलाब से खूबसूरत आदर्श,
एक ही वायु के झोके से बिखरने को तैयार
अब तो उम्मीद के दामन में,
कोई शुभ्र कली खिलकर फूल नहीं बनती,
अब कोई अर्थवती आशा,
शब्दों के बाज़ार नहीं लगाती
और मैं,
युगों से एक ही शब्द की तलाश में
बेसुध भटक रहा हूं ,
जिस शब्द को किसी सुघर बाला ने
मेरे लिए बनाये थे
सपनों से जोड़े थे
प्रेम मणियों से सजाये थे
रंगे थे सपनीली आंखों के बहुरंगी रंगों से
वही एक शब्द
सिर्फ एक ही शब्द
पा न सका क्यूं कर ?

शनिवार, 13 मार्च 2010

बौने होते शब्द

अन्तहीन शब्दों की कतार के पीछे
दुबक कर-छिपकर मैं बचा हूं
बौने होते शब्द
अब और बौने हो गये
बौनेपन के क्रमिक विकास से
शब्दों के निरन्तर ह्रास से
मैं डर गया हूं

कल सुबह
मैं शब्दों के ऊपर शब्द लगाकर
जोड़-जोड़ ऊँचा बनाकर
छिपने लायक सजाकर
रखूंगा
क्या अर्थहीन स्वयं को
इनके पीछे छिपा पाऊँगा ?
इन्हीं सब उधेड़ बुन में
शब्दों और मुहावरों के ढेर से
एक मधुर-शीतल मौलिक शब्द
ढ़ूढ़कर ,छाँट्कर , जाँचकर
तुम्हें देना चाहता था
किन्तु !
प्रश्न चिह्न की तरह धुन्ध
मुझे और मेरे शहतूत के पेड़ों को
घेर लेते हैं
मैंने बहुत चाहा
सरस पके इन मीठे फलों जैसा
कुछ शब्द लाकर
तुम्हें भेंट दूँ,
परन्तु !
समय की ऊँचाइयों से गिरकर
बड़े-बड़े शैल खण्डों से शब्द
आज मेरी गली मे खेलते बच्चों की
मिट्टी की छोटी-छोटी गोलियो सा
मेरे मन के द्वार पर
लुढ़क-ढुलक रहे हैं
मैं इनके लघु चिकने रूप पर
आँखें नम करता रहता हूँ
और ये बेहया शब्द
अपनी लाश अपने क्न्धों पर रखे
फूले नहीं समाते....

बुधवार, 23 सितंबर 2009

आख़िर कब तक ?

आओ हम प्रणाम करे
जनता के कवि को
जो सूखे दरख्त पर तरस खाकर
दो-चार अल्फाज़ कह देता है
रच देता है कविता
आवाम की ,हमारी- तुम्हारी
चुपचाप रहो
हमारे इस महान कवि के
राष्ट्रीय ज्ञानपीठ पुरस्कार पा लेने तक
इनको
इन कथित
सफ़ेद कालर बुद्धिजीवियों को
रचने दो कविता
अहसासों की मछलियों को
पकड़-पकड़ रखने दो
लेकिन यह मत भूलो कि
एक छोटी मछली
मिलती है घंटो कांटे डाल
चिलचिलाती धूप में बैठे किसी मछेरे को ,
ऐसे ही कमाए किसी एहसास को
तलकर, भून कर ,खाकर देखो
तुम्हें तुम्हारी मेहनत का असली स्वाद मिलेगा
बालों के गुलाब द्बारा
कहार के कंधो के घट्टो से
पूछे गए प्रश्न सभी
बेमानी है कि जब ये
चीथडो में लपेट कर गरीबी का एहसास
काफी हाउस के प्यालो में सजाकर
इस महान देश को पेश करते हैं
तब मुझे याद आता है
ढेर सारे भाषणों का देश
जिस पर दूध -भात खाते कवि
कवितायें करते हैं -
सूखी रोटी की
नंगी बेटी की
रूसी -अमरीकी मदिरा में लेखनी डुबो कर ,
और बात करते हैं सर्वहारा क्रांति की
मांसल उभारों पर टिकी हुई -
एक महान कविता
ठण्ड से सिकुड़ी मुडी-तुड़ी ठठरी की
क्या सच ही हम सुनेगें इन्हें ?
आख़िर कब तक?

उपलब्धियां बनाम अनुपलब्धियां

एक सफल आदमी ,
दो मिलें ,
तीन कारखाने
चार दुकाने
पाँच कारें
छः ट्रकें
सात गुंडे
आठ हथकंडे
नौ मुक़दमे
दस ख़रीदी डिग्रियां
अर्थात उपलब्धियां

एक असफल आदमी ,
दो रोटियां ,
तीन घूँट प्यार ,
चार सुकून की साँसे ,
पाँच का सम्मान ,
छः फीट की ठांव ,
सात किल्लते ,
आठ मिन्नतें
नौ कवितायें
दस देश प्रेम के कहानियां
अर्थात अनुपलब्धियां